सबादा में चकबंदी और दो बिस्वा जमीन के प्रलोभन पर हलचल

सबादा में चकबंदी और दो बिस्वा जमीन के प्रलोभन पर हलचलसबादा में चकबंदी और दो बिस्वा जमीन के प्रलोभन पर हलचल, शाम के कथित ‘दरबार’ में घटना को लेकर उठे सवाल

बांदा। ग्राम पंचायत सबादा में चकबंदी, गरीब परिवारों को दो-दो बिस्वा जमीन दिए जाने की चर्चाओं और पंचायत की राजनीति को लेकर ग्रामीणों के बीच हलचल तेज है। इसी बीच करीब पांच दिन पहले ग्राम प्रधान के घर पर शाम के समय लगने वाली कथित बैठक या ‘दरबार’ में हुई बताई जा रही एक घटना ने चर्चाओं को और हवा दे दी है।

सबादा में चकबंदी और दो बिस्वा जमीन के प्रलोभन पर हलचल के बीच स्थानीय स्तर पर सामने आई इस घटना को लेकर ग्रामीणों के बीच तरह-तरह की चर्चाएं हैं। स्थानीय नेता से फोन पर हुई बातचीत में उन्होंने दावा किया कि ग्राम प्रधान के घर पर शाम को नियमित रूप से लोगों की बैठक होती है और इसी कथित ‘दरबार’ में करीब पांच दिन पहले विवादित घटना हुई।

स्थानीय नेता का आरोप है कि इस दौरान ग्राम प्रधान के आसपास रहने वाले कुछ लोग, जिन्हें ग्रामीण बातचीत में कथित रूप से ‘दरबारी’ और ‘चाटुकार’ कहते हैं, भी मौजूद थे और उन्होंने कथित रूप से पूरे मामले में भूमिका निभाई।

हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि UP Ki Awaaz.com नहीं करता है। खबर में इन्हें स्थानीय व्यक्ति के बयान और ग्रामीण चर्चाओं के आधार पर प्रस्तुत किया जा रहा है।

ग्राम प्रधान के घर पर शाम की बैठक को लेकर चर्चा

स्थानीय नेता के अनुसार ग्राम प्रधान के घर पर शाम के समय नियमित रूप से लोगों का जमावड़ा होता है। इसी बैठक को स्थानीय स्तर पर कुछ लोग कथित रूप से ‘दरबार’ कहकर संबोधित करते हैं।

नेता का दावा है कि करीब पांच दिन पहले इसी बैठक के दौरान कुछ लोगों के साथ कथित रूप से अभद्र भाषा और गाली-गलौज की गई।

उन्होंने फोन पर कहा कि गरीब लोग अपनी बात खुलकर रखने में डरते हैं और उन्हें आशंका रहती है कि प्रभावशाली लोगों के सामने बोलने के बाद उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

इन दावों की पुष्टि के लिए संबंधित लोगों के बयान और उपलब्ध प्रमाण आवश्यक होंगे।

सबादा में चकबंदी और दो बिस्वा जमीन के प्रलोभन पर हलचल के बीच ग्रामीण अब पूरे मामले की स्पष्ट जानकारी चाहते हैं।

कथित ‘दरबारियों’ और ‘चाटुकारों’ की भूमिका पर सवाल

स्थानीय चर्चाओं में यह आरोप भी सामने आया है कि ग्राम प्रधान के आसपास रहने वाले कुछ लोग हर मामले में उनका समर्थन करते हैं और विरोध करने वालों के साथ कथित रूप से विवाद में शामिल हो जाते हैं।

स्थानीय नेता ने ऐसे लोगों के लिए ‘दरबारी’ और ‘चाटुकार’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया और दावा किया कि पांच दिन पहले की कथित घटना में भी ऐसे लोगों की भूमिका रही।

हालांकि, किसी व्यक्ति को ‘चाटुकार’ या किसी घटना में जिम्मेदार बताने से पहले ठोस प्रमाण आवश्यक हैं। इसलिए इस खबर में इसे आरोप और स्थानीय चर्चा के रूप में ही रखा जा रहा है।

गरीब हैं, इसलिए आवाज नहीं उठा पाते स्थानीय नेता का दावा

फोन पर बातचीत के दौरान स्थानीय नेता ने कहा, “हम गरीब हैं और आवाज भी नहीं उठा पाते। हमारे साथ बहुत गलत होता है।” हमारे पूरे पिछड़े जाति यो को अपमान जनक,जतिसूचक शब्दो का इस्तेमाल करते है इनके जो दरबारी, चाटुकर है ये सब ग्राम प्रधान के सामने होता है

उन्होंने कथित गाली-गलौज और अपमानजनक व्यवहार का भी दावा किया।

यह बयान संबंधित व्यक्ति की हमारे सूत्र से फोन पर पूरी व्यवथा सुनाई और कहा जो गरीब कोई सवाल करता है तो

उसको प्रधान जी के दरबारी, चाटु कार  बोलते है  प्रधान जी के बारे अनाप सनाप् मत बोलो प्रधान जी  तो देवता, फरिस्ता, भगवान् है हमारे पुरे गाँव मे गली, मोहल्लो मे ये दरबारी, चाटुकार जा जा कर गाँव के लोगों को धमकी देते रहते है गाँव मे प्रधान जी के अनुकूल माहोल बनाते है उनके झूट को सही करते रहते है

दो बिस्वा जमीन के कथित प्रलोभन पर भी सवाल

सबादा में चकबंदी के साथ गरीब परिवारों को दो-दो बिस्वा जमीन दिए जाने की चर्चा भी प्रमुख मुद्दा बनी हुई है।

सबादा में चकबंदी और दो बिस्वा जमीन के प्रलोभन पर हलचल के बीच ग्रामीण जानना चाहते हैं कि यह जमीन वास्तव में किस सरकारी प्रक्रिया के तहत मिलेगी।

किसे जमीन मिलेगी? कितनी जमीन मिलेगी? पात्रता क्या होगी? किस सरकारी आदेश के तहत जमीन दी जाएगी? और क्या इसका रिकॉर्ड चकबंदी विभाग के दस्तावेजों में उपलब्ध है?

इन सवालों का जवाब सरकारी रिकॉर्ड से ही स्पष्ट हो सकता है।

सबादा में चकबंदी और दो बिस्वा जमीन के प्रलोभन पर हलचल के बीच ग्रामीण अब पूरे मामले की स्पष्ट जानकारी चाहते हैं।

क्या जमीन का मुद्दा चुनावी राजनीति से जुड़ा है?

आने वाले पंचायत चुनाव को देखते हुए कुछ ग्रामीण दो बिस्वा जमीन देने की चर्चा को चुनावी आश्वासन के रूप में देख रहे हैं।

हालांकि बिना दस्तावेज के इसे चुनावी प्रलोभन कहना उचित नहीं होगा। यदि कोई आधिकारिक योजना है तो उसके नियम और रिकॉर्ड सामने आने चाहिए।

यही वजह है कि सबादा में चकबंदी और दो बिस्वा जमीन के प्रलोभन पर हलचल के बीच ग्रामीण सरकारी प्रक्रिया की स्पष्ट जानकारी चाहते हैं।

सबादा में पंचायत चुनाव 2026 से जुड़ी पिछली खबर भी पढ़ें।

दूसरे प्रदेशों में रहने वाले ग्रामीण भी गांव से जुड़े हैं

सबादा के अनेक लोग रोजगार, नौकरी और व्यापार के लिए उत्तर प्रदेश से बाहर दूसरे प्रदेशों में रहते हैं।

महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और देश के दूसरे हिस्सों में रहने वाले लोगों के परिवार, जमीन, मकान और सामाजिक संबंध अब भी गांव से जुड़े हुए हैं।

इसलिए केवल दूसरे प्रदेश में रहने के आधार पर किसी ग्रामीण को ‘बाहरी’ कहना उचित है या नहीं, यह भी ग्रामीणों के बीच चर्चा का विषय है।

गांव से बाहर रहने वाले लोग भी गांव के विकास और पंचायत के सार्वजनिक मुद्दों पर अपनी राय रख सकते हैं। हालांकि मतदाता और अन्य कानूनी अधिकार संबंधित कानून और सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार निर्धारित होते हैं।

पंचायत के विकास कार्यों का हिसाब भी जरूरी

 की मांग है कि पंचायत के सड़क, नाली, पानी, पंचायत भवन और अन्य विकास कार्यों पर हुए सरकारी खर्च का रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाए।

सवाल यह है कि कितना पैसा आया, किस काम के लिए आया, कितना खर्च हुआ और जमीन पर वास्तविक काम कितना हुआ।

बिना जांच किसी वित्तीय अनियमितता को भ्रष्टाचार कहना उचित नहीं होगा, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड की जांच और पारदर्शिता की मांग जरूर की जा सकती है।

सबादा में चकबंदी और दो बिस्वा जमीन के प्रलोभन पर हलचल के बीच ग्रामीण अब पूरे मामले की स्पष्ट जानकारी चाहते हैं।

करीब 15 वर्षों के पंचायत प्रभाव पर चर्चा

स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार पिछले करीब 15 वर्षों से एक ही परिवार का पंचायत की राजनीति में प्रभाव रहा है। स्थानीय चर्चाओं में बलराम का नाम भी सामने आता है।

ऐसे में ग्रामीणों के बीच यह सवाल उठता है कि लंबे समय के पंचायत प्रभाव के दौरान गरीब परिवारों के लिए जमीन और गांव के विकास को लेकर क्या प्रयास किए गए।

हालांकि किसी व्यक्ति की जिम्मेदारी या भूमिका तय करने के लिए सरकारी रिकॉर्ड और प्रमाण जरूरी होंगे।

दूसरे प्रदेशों में रहने वाले लोगों को ‘बाहरी’ कहना कितना उचित?

सबादा के अनेक ग्रामीण रोजगार और बेहतर अवसरों की तलाश में दूसरे प्रदेशों में रहते हैं। कोई महाराष्ट्र में है तो कोई गुजरात, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश या देश के किसी अन्य हिस्से में काम करता है।

दूसरे प्रदेश में रहने के बावजूद इन लोगों के परिवार और सामाजिक संबंध गांव से जुड़े रहते हैं। इसलिए केवल बाहर रहने के आधार पर किसी व्यक्ति को गांव से अलग मानना उचित है या नहीं, यह भी गंभीर सवाल है।

दूसरे प्रदेसो या परदेसी व्यक्तियों के उपर भारी दबाव स्वम् ग्राम प्रधान डालते हैं कोई भी उनके सामने सवाल, या विकास या अन्य मामले में बोलता हैं तो प्रधान जी सीधा बोलते है मुंबई, जा कर काम करो यहाँ के बारे ज्यादा मत सोचो नही तो भूखो मर जाओगे ज्यादा चु चा की तो इतने फर्जी मुकदमे लगवा दूँगा तुम्हारा प्रदेश जाना भूल जाओ गे

ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते है यहाँ के ग्राम प्रधान

इसके सबूत व व्यक्ति भी हैं हमारे पास इसकी पुष्टि करते है

गांव में कथित ‘दलाली’  व धमकी को लेकर भी चर्चा

स्थानीय चर्चाओं में गांव और पुलिस से जुड़े मामलों में कथित बिचौलियागिरी या ‘दलाली’ किए जाने के आरोप भी सामने आए हैं।

कुछ लोगों का दावा है कि ऐसे मामलों पर सवाल उठने के बाद कथित बिचौलियों और उनके समर्थकों के बीच बेचैनी बढ़ी है। स्थानीय भाषा में कुछ लोग इसे ‘दुकानें बंद होने’ जैसी स्थिति से जोड़कर देख रहे हैं।

सोशल मीडिया पर बढ़ी राजनीतिक बहस

सबादा में पंचायत की राजनीति अब सोशल मीडिया तक पहुंच चुकी है। समर्थक और विरोधी दोनों अपनी-अपनी बातें सामने रख रहे हैं।

लेकिन व्यक्तिगत अपमान, गाली-गलौज और बिना प्रमाण आरोप लगाने से बचना जरूरी है। सार्वजनिक मुद्दों पर बहस हो तो उसे दस्तावेज और तथ्यों के आधार पर होना चाहिए।

सबादा में चकबंदी और दो बिस्वा जमीन के प्रलोभन पर हलचल के बीच सोशल मीडिया पर भी पंचायत से जुड़े मुद्दों को लेकर चर्चा तेज है।

अब सबादा को वादों से ज्यादा परिणाम चाहिए

ग्रामीणों को बेहतर सड़क, साफ नालियां, पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, रोजगार और सरकारी योजनाओं का लाभ चाहिए।

चकबंदी और जमीन से जुड़े मामलों में भी स्पष्ट जानकारी सामने आनी चाहिए।

यदि गरीब परिवारों को वास्तव में दो-दो बिस्वा जमीन देने की कोई सरकारी प्रक्रिया चल रही है तो उसका रिकॉर्ड सार्वजनिक होना चाहिए। यदि यह केवल आश्वासन है तो उसकी वास्तविक स्थिति भी स्पष्ट होनी चाहिए।

सबादा में चकबंदी और दो बिस्वा जमीन के प्रलोभन पर हलचल के बीच ग्रामीण अब राजनीतिक दावों से ज्यादा सरकारी रिकॉर्ड और जमीन पर दिखाई देने वाले परिणाम चाहते हैं।

सबसे बड़ा सवाल सच्चाई सामने कब आएगी

पांच दिन पहले ग्राम प्रधान के घर पर शाम की कथित बैठक में वास्तव में क्या हुआ? क्या वहां गाली-गलौज हुई? क्या गरीब और कमजोर वर्ग के लोगों के साथ अभद्र व्यवहार किया गया? कथित ‘दरबारियों’ और ‘चाटुकारों’ की भूमिका क्या थी? दो बिस्वा जमीन देने की बात का सरकारी आधार क्या है? और क्या चकबंदी के रिकॉर्ड में गरीब परिवारों के लिए जमीन की कोई वास्तविक व्यवस्था है?

इन सभी सवालों का जवाब संबंधित लोगों के बयान, सरकारी रिकॉर्ड और उपलब्ध प्रमाणों से ही मिल सकता है।

सबादा में चकबंदी और दो बिस्वा जमीन के प्रलोभन पर हलचल के बीच UP Ki Awaaz.com का उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष को बदनाम करना नहीं, बल्कि ग्रामीणों के सवालों और सार्वजनिक हित से जुड़े मुद्दों को सामने रखना है।

जिन लोगों या पक्षों पर सवाल उठाए गए हैं, उनका पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी उचित स्थान और प्रमुखता के साथ प्रकाशित किया जाएगा।


रिपोर्ट: UP Ki Awaaz.com
Founder & CEO: Riyazuddin Jaheer Khan

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top